पैरा तीरंदाज शीतल देवी की नज़र में 'खेलो इंडिया' योजना, बोलीं- 'यह पैरा-स्पोर्ट्स के लिए गेम-चेंजर साबित होगी'
विश्व चैंपियन और पैरालंपिक पदक विजेता पैरा-कंपाउंड तीरंदाज शीतल देवी का मानना है कि केंद्र सरकार की नई 'खेलो इंडिया योजना' देश में पैरा-स्पोर्ट्स के लिए एक बड़ा बदलाव ला सकती है। उन्होंने इस बात पर…
विश्व चैंपियन और पैरालंपिक पदक विजेता पैरा-कंपाउंड तीरंदाज शीतल देवी का मानना है कि केंद्र सरकार की नई 'खेलो इंडिया योजना' देश में पैरा-स्पोर्ट्स के लिए एक बड़ा बदलाव ला सकती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सबसे बड़ी चुनौती प्रतिभा की नहीं, बल्कि अवसरों की कमी है, और यह योजना इसी अंतर को पाट सकती है।
समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, शीतल ने कहा कि इस योजना से दिव्यांग प्रतिभाशाली बच्चों की शुरुआती पहचान करने और उन्हें सफल होने के लिए आवश्यक सहयोग देने में मदद मिलेगी। जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के एक दूरदराज के गांव से निकलकर दुनिया की शीर्ष तीरंदाज बनने का अपना सफर याद करते हुए उन्होंने कहा, "किश्तवाड़ की एक लड़की को अच्छी कोचिंग और सहयोग मिला, तभी वह शीतल देवी बन पाई जिसे आज दुनिया जानती है।"
अवसर और पहुँच सबसे बड़ी चुनौती
18 वर्षीय शीतल देवी ने कहा कि उनकी कहानी सफलता की है, लेकिन हो सकता है कि किसी दूरदराज के गांव में उतना ही काबिल बच्चा यह तक न जानता हो कि पैरा-स्पोर्ट्स होते हैं। उन्होंने कहा, "हमारे बीच का फर्क आम तौर पर अवसर का होता है। मैं शुक्रगुजार हूं कि मुझे वह मिला।" शीतल के मुताबिक, भारत के गांवों और छोटे शहरों में हजारों दिव्यांग बच्चों में अपार क्षमता है, लेकिन कई प्रतिभाओं को कभी खोजा ही नहीं जा सका।
नई योजना की संरचना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पहल के तहत अगले पांच सालों में खेलों के विकास पर 29,054 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। शीतल ने बताया कि इस योजना के नौ मुख्य हिस्सों में प्रतिभा खोज, कोच और सहयोगी स्टाफ का विकास, और खेल सुविधाओं के साथ-साथ हाई-परफॉर्मेंस ट्रेनिंग के माहौल को मजबूत करना शामिल है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि योजना की सफलता केंद्र और राज्यों के सक्रिय सहयोग पर निर्भर करेगी।
स्थानीय स्तर पर सुविधाओं का महत्व
शीतल ने इस बात पर खुशी जताई कि योजना का एक बड़ा फोकस पैरा-ट्रेनिंग सुविधाओं और मान्यता प्राप्त अकादमियों को बढ़ाने पर है। उन्होंने कहा, "हर बच्चा कोच या ट्रेनिंग सेंटर के लिए सैकड़ों किलोमीटर का सफर नहीं कर सकता। अगर अच्छी पैरा-स्पोर्ट अकादमियां और प्रशिक्षित कोच बच्चों के घर के पास होंगे, तो परिवार भी उन्हें खेल में भेजने के लिए प्रोत्साहित होगा।" उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय कोच, भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) और सरकार से मिले पूर्ण सहयोग को दिया, जिसने उन्हें बड़े सपने देखने का आत्मविश्वास दिया।
शुरुआती पहचान और समर्थन
पैरालंपिक पदक विजेता के अनुसार, इस योजना की सबसे खास बात 'पैरा खेलो इंडिया एथलीट्स' और 'इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट्स' का एक समूह बनाना है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि प्रतिभाशाली युवाओं को शुरुआती चरण में ही पहचानकर उनके विकास के हर स्तर पर समर्थन दिया जाए। उन्होंने कहा, "पैरा-एथलीटों के लिए शुरुआती पहचान महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई दिव्यांग बच्चे जागरूकता या अवसरों की कमी के कारण खेल में देर से आते हैं।"
अंत में, शीतल ने कहा कि योजना का असली प्रभाव सिर्फ पदकों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से आंका जाएगा कि कितने दिव्यांग बच्चे खेल को अपनाने का आत्मविश्वास महसूस करते हैं। उन्होंने कहा, "पदक जीतने का सफर इसी विश्वास से शुरू होता है।"
इनपुट: IANS


