भारत के पहले पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट की कहानी: युद्ध में 9 गोलियां खाईं, फिर तैराकी में रचा इतिहास
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 9 गोलियां लगने और एक गोली रीढ़ में धंस जाने के बाद उनका सैन्य और बॉक्सिंग करियर समाप्त हो गया। लेकिन मुरलीकांत पेटकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने व्हीलचेयर से…
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 9 गोलियां लगने और एक गोली रीढ़ में धंस जाने के बाद उनका सैन्य और बॉक्सिंग करियर समाप्त हो गया। लेकिन मुरलीकांत पेटकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने व्हीलचेयर से वापसी करते हुए तैराकी में हाथ आज़माया और 1972 में जर्मनी में हुए पैरालंपिक खेलों में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, पेटकर ने यह ऐतिहासिक उपलब्धि 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी स्पर्धा में हासिल की थी। उनकी यह जीत महज़ एक पदक नहीं, बल्कि अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प की मिसाल है।
सेना का बॉक्सर से पैरालंपिक चैंपियन तक का सफर
मुरलीकांत पेटकर का जन्म 1 नवंबर 1944 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के पेठ इस्लामपुर गांव में हुआ था। खेलों में बचपन से ही गहरी रुचि रखने वाले पेटकर अपनी अच्छी कद-काठी के दम पर भारतीय सेना में भर्ती हुए। सेना में उन्होंने बॉक्सिंग को चुना और अपने दमदार पंचों की बदौलत तेज़ी से सफलता हासिल की। 1964 में उन्हें इंटरनेशनल सर्विसेज स्पोर्ट्स मीट में सेना का प्रतिनिधित्व करने का मौका भी मिला।
एक युद्ध जिसने बदल दी ज़िंदगी
1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान एक हवाई हमले ने पेटकर की ज़िंदगी को पूरी तरह बदल दिया। उन्हें 9 गोलियां लगीं और एक टैंक भी उनके ऊपर से गुज़र गया। कई महीनों तक मौत से जूझने के बाद वे बच तो गए, लेकिन रीढ़ की हड्डी में गोली लगने की वजह से हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आ गए।
बॉक्सिंग छोड़ने के लिए मजबूर होने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और तैराकी में एक पैरा-एथलीट के तौर पर नई शुरुआत की। राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने के बाद उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भी हिस्सा लिया, जिसका शिखर 1972 का पैरालंपिक स्वर्ण था। उनके इस असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2018 में पद्मश्री और 2025 में लाइफटाइम अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया।
इनपुट: IANS


