‘मिशन चमत्कार’ से कॉमनवेल्थ गेम्स तक: चोट से उबरकर पोडियम पर नज़र गड़ाए हुए हैं तेजस शिर्से
पिछले साल टखने की गंभीर चोट के कारण लगभग रेस से बाहर हो चुके भारत के राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक तेजस शिर्से अब कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में पदक जीतने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। 23 वर्षीय इस एथलीट ने अपनी…
पिछले साल टखने की गंभीर चोट के कारण लगभग रेस से बाहर हो चुके भारत के राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक तेजस शिर्से अब कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में पदक जीतने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। 23 वर्षीय इस एथलीट ने अपनी वापसी को 'मिशन चमत्कार' का नाम दिया और अब उनका एकमात्र लक्ष्य जीतना है, ताकि देश में 110-मीटर बाधा दौड़ को भाला फेंक (जैवलिन) जैसी लोकप्रियता मिल सके।
समाचार एजेंसी IANS से हुई एक खास बातचीत में तेजस ने अपने इरादे साफ करते हुए कहा, "जीतना ही एकमात्र लक्ष्य है। मैं वहां जाकर यह नहीं कहना चाहता कि यह प्रक्रिया का हिस्सा है। प्रक्रिया मेरे लिए है। दुनिया के लिए जीत ही मायने रखती है। मुझे बस जीत की परवाह है।" उनका मानना है कि जब तक कोई एथलीट देश के लिए बड़ा पदक नहीं जीतता, तब तक उस खेल को पहचान नहीं मिलती।
चोट से चमत्कारिक वापसी
कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स तक का सफर तेजस के लिए आसान नहीं था। पिछले साल एक टक्कर के दौरान उनका टखना तीन-चार जगहों से लगभग टूट गया था, जिससे वे काफी निराश हो गए थे। उन्होंने बताया, "सब कुछ सही करने के बावजूद, और बिना कुछ गलत किए भी, मेरे साथ ऐसा हो गया।" हालांकि, रिलायंस फाउंडेशन की स्पोर्ट्स साइंस टीम की देखरेख में उन्होंने वापसी की, जिसमें कोच जेम्स हिलियर, फिजियो नीलेश मकवाना और कंडीशनिंग कोच क्षितिज भोइते शामिल थे। अप्रैल के मध्य में ट्रेनिंग शुरू करने के बाद, मई-जून में क्वालिफिकेशन हासिल करना एक चमत्कार जैसा था।
‘फ्री हिट’ की तरह लिया मौका
रांची में फेडरेशन कप में 13.67 और 13.50 सेकंड का समय निकालने के बाद तेजस की सोच में बड़ा बदलाव आया। उन्होंने इस मौके को एक 'फ्री हिट' की तरह देखा और लुधियाना में 13.27 सेकंड का समय निकालकर क्वालिफिकेशन मानक (13.39 सेकंड) को पार कर लिया। वे कहते हैं, "जीतने या हारने पर मैं न तो बहुत खुश होता हूं और न ही बहुत दुखी, और मुझे लगता है कि इससे मुझे अपने खेल में बेहतर परफॉर्म करने में मदद मिल रही है।"
बाधाओं ने ही चुना रास्ता
छत्रपति संभाजीनगर में पले-बढ़े तेजस की पृष्ठभूमि काफी साधारण रही है। सुविधाओं की कमी के चलते उन्हें इंटरनेट ट्यूटोरियल से खेल सीखना पड़ा और ट्रेनिंग के लिए लकड़ी की बाधाएं बनानी पड़ीं। वे कहते हैं, "असल में यह जिंदगी को भी दर्शाता है। कुछ रुकावटें होती हैं जिन्हें आपको पार करना होता है... मैं कहूंगा कि हर्डल्स ने मुझे चुना है, मैंने उसे नहीं चुना।"
बड़े मंच की बड़ी चुनौती
कॉमनवेल्थ गेम्स में तेजस का सामना जमैका और कैरिबियन के धावकों से होगा, जबकि एशियन गेम्स में जापान और चीन के एथलीट कड़ी चुनौती पेश करेंगे। इन सबसे बेफिक्र तेजस का ध्यान सिर्फ खुद पर है। उन्होंने कहा, "मैं जितना ज्यादा खुद पर फोकस करूंगा, उतना ही कम दबाव महसूस करूंगा। दबाव एक अच्छी चीज है।" उनका लक्ष्य है कि वे हर्डल्स में कुछ ऐसा करें जिससे भारत में इस दिलचस्प खेल को नई पहचान मिले, ठीक वैसे ही जैसे नीरज चोपड़ा ने जैवलिन को दिलाई।
इनपुट: IANS


