रविवार, 1 नवम्बर 2026 · नई दिल्ली
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एशियाई गेम्स: फाइनल की रुकावटें मेरे लिए 'भगवान की कृपा' बनीं - शूटर ईशा सिंह

आइची-नागोया में चल रहे एशियाई गेम्स 2026 में भारतीय निशानेबाज ईशा सिंह ने महिलाओं की 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में रजत पदक अपने नाम किया। लेकिन उनके लिए यह जीत सिर्फ एक मेडल से कहीं बढ़कर थी। फाइनल के…

एशियाई गेम्स: फाइनल की रुकावटें मेरे लिए 'भगवान की कृपा' बनीं - शूटर ईशा सिंह
(फोटो: IANS)

आइची-नागोया में चल रहे एशियाई गेम्स 2026 में भारतीय निशानेबाज ईशा सिंह ने महिलाओं की 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में रजत पदक अपने नाम किया। लेकिन उनके लिए यह जीत सिर्फ एक मेडल से कहीं बढ़कर थी। फाइनल के दौरान कई तकनीकी रुकावटें और जजों की गलतियों ने मुकाबले को उतार-चढ़ाव भरा बना दिया, लेकिन 21 वर्षीय ईशा मानती हैं कि यही बाधाएं अंत में उनके लिए वरदान साबित हुईं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन रुकावटों ने उन्हें बढ़ते दबाव और शारीरिक थकान से उबरने का कीमती समय दिया।

ईशा ने फाइनल में आठवें स्थान पर रहते हुए क्वालिफाई किया था, जिसके बाद मेडल राउंड किसी रोमांचक मुकाबले से कम नहीं रहा। इसमें कई शूट-ऑफ, तकनीकी दिक्कतें और स्वर्ण पदक के लिए चीन की शियाओ जियारुइक्सुआन के साथ एक लंबी टक्कर देखने को मिली।

थकान और दबाव के बीच मिला आराम

जैसे-जैसे फाइनल आगे बढ़ा, ईशा के लिए शारीरिक थकान एक बड़ी चुनौती बन गई। उन्होंने बताया, "मेरा हाथ थोड़ा थक गया था क्योंकि स्वर्ण पदक के लिए मुकाबला करने वाले किसी भी अन्य खिलाड़ी ने उतने शॉट नहीं लगाए जितने मैंने लगाए थे।" मुकाबले के तनावपूर्ण पलों में वह बार-बार अपना हाथ हिलाकर जकड़न कम करने की कोशिश कर रही थीं।

ईशा ने कहा, "मैं जजों की गलतियों के लिए शुक्रगुजार थी, क्योंकि मुझे थोड़ा आराम मिल गया। शायद आप इसे भगवान की कृपा कह सकते हैं कि मुझे थोड़ा समय मिला और सोचने का मौका मिला।" उन्होंने माना कि आमतौर पर ऐसी रुकावटें एथलीट की लय तोड़ देती हैं, लेकिन उनके मामले में इसने वास्तव में मदद की।

चुनौतियों से मिली मानसिक मजबूती

ईशा सिंह ने इस अनुभव को अद्भुत बताते हुए कहा कि उन्होंने पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया। उन्होंने स्वीकार किया कि फाइनल के दौरान कई बार वह बाहर होने की कगार पर थीं, लेकिन उन्होंने अपना ध्यान बनाए रखा। उन्होंने कहा, "मुझे पता था कि मैं यह कर सकती हूं। मैंने पूरे दिल से संघर्ष किया।"

ईशा ने इस अनुभव की तुलना ओलंपिक के दबाव से की और कहा कि इस मैच ने उन्हें उन पुरानी मुश्किलों का सामना करने का मौका दिया, जिनसे वह पहले पार नहीं पा सकी थीं। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि अब मैं सच में ज्यादा मजबूत महसूस कर रही हूं, क्योंकि क्वालिफिकेशन में भी, रैपिड राउंड में, मैं कम से कम आखिरी सीरीज में वापसी कर पाई।"

दर्शकों में पिता का मिला साथ

फाइनल के दौरान दर्शकों में मौजूद अपने पिता के समर्थन का जिक्र करते हुए ईशा ने कहा, "मैं हमेशा अपने पापा की आवाज सुन सकती हूं। मुझे लगता है कि वे जजों से बहुत नाराज थे।" उन्होंने कहा कि निशानेबाजी जैसे खेल में गुस्सा जाहिर नहीं कर सकते और शांत रहना ही सबसे बड़ी चुनौती होती है, लेकिन उन्हें अपने पिता की प्रतिक्रिया जायज लगी।

इनपुट: IANS

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News4Social स्पोर्ट्स डेस्क

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