रविवार, 30 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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विभाजन का वो खौफनाक मंज़र, जब ट्रेन के नीचे लटककर दिल्ली पहुंचे थे पद्मभूषण पंडित बसवराज राजगुरु

भारतीय शास्त्रीय संगीत के आसमान में पंडित बसवराज राजगुरु एक ऐसे सितारे के तौर पर याद किए जाते हैं, जिनकी गायकी में किराना, ग्वालियर और पटियाला घरानों की परंपराओं का अनूठा संगम था। लेकिन संगीत की…

विभाजन का वो खौफनाक मंज़र, जब ट्रेन के नीचे लटककर दिल्ली पहुंचे थे पद्मभूषण पंडित बसवराज राजगुरु
(फोटो: IANS)

भारतीय शास्त्रीय संगीत के आसमान में पंडित बसवराज राजगुरु एक ऐसे सितारे के तौर पर याद किए जाते हैं, जिनकी गायकी में किराना, ग्वालियर और पटियाला घरानों की परंपराओं का अनूठा संगम था। लेकिन संगीत की दुनिया में शिखर तक पहुंचने वाले राजगुरु की जिंदगी में एक ऐसा भी दौर आया, जब उन्हें अपनी जान बचाने के लिए एक ट्रेन के नीचे लटककर सीमा पार करनी पड़ी थी। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह दिल दहला देने वाली घटना 1947 में देश के विभाजन के दौरान हुई थी।

24 अगस्त 1917 को कर्नाटक के धारवाड़ जिले के यालीवाल गांव में जन्मे बसवराज को संगीत विरासत में मिला था। उनके पिता तंजावुर परंपरा के कर्नाटक संगीत के विद्वान थे, जिससे बचपन से ही उनकी रुचि संगीत में हो गई। 13 साल की उम्र में पिता के निधन के बाद, वह अपने चाचा के साथ हुबली आ गए, जहाँ उनकी मुलाकात संत और संगीत गुरु पंचाक्षरी गवई से हुई, जिन्होंने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें अपना शिष्य बना लिया।

संगीत की कठिन साधना

गुरु पंचाक्षरी गवई के सानिध्य में उनकी संगीत शिक्षा बेहद कठोर थी। उन्हें हर दिन 12 से 15 घंटे तक रियाज करना पड़ता था। इस तपस्या का ही नतीजा था कि 1936 में हम्पी में विजयनगर साम्राज्य की 600वीं वर्षगांठ के मौके पर उन्होंने अपने गुरु के साथ करीब 15,000 लोगों के विशाल जनसमूह के सामने प्रस्तुति दी। गुरु के निधन के बाद भी उनकी सीखने की ललक कम नहीं हुई। 1944 में वह मुंबई पहुंचे और सुरेशबाबू माने से संगीत सीखा। इसके बाद वे संगीत की बारीकियां सीखने पाकिस्तान के कराची गए और करीब छह महीने तक लतीफ खान से प्रशिक्षण लिया।

विभाजन और जान बचाने का संघर्ष

कराची में संगीत की तालीम लेते समय ही 1947 में देश का विभाजन हो गया। उनके उस्ताद लतीफ खान ने उन्हें हिंदुओं से भरी एक ट्रेन में बैठाकर भारत के लिए रवाना किया। लेकिन सीमा के पास ट्रेन को रोककर यात्रियों पर हमला कर दिया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए। राजगुरु किसी तरह अपनी जान बचाने में कामयाब रहे। बताया जाता है कि वह ट्रेन के एक डिब्बे के नीचे लटक गए और उसी हालत में सीमा पार कर दिल्ली तक का सफर तय किया। भारत लौटने के बाद उन्होंने पुणे और फिर अपने गृहनगर धारवाड़ को अपना ठिकाना बनाया और संगीत साधना में रम गए।

पुरस्कार और सम्मान

पंडित बसवराज राजगुरु की प्रतिभा सिर्फ खयाल गायकी तक सीमित नहीं थी, वह ध्रुपद-धमार, ठुमरी, गजल, नाट्यगीत और वचन गायकी में भी माहिर थे। संगीत में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1975 में पद्मश्री और 1991 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया और कर्नाटक विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की। 21 जुलाई 1991 को इस महान संगीतकार का निधन हो गया।

इनपुट: IANS

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