जूडो में तूलिका मान की कामयाबी: अकेलेपन से कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम तक का सफ़र
बचपन में अकेलेपन को दूर करने के लिए शुरू किया गया एक खेल कैसे देश के लिए पदक जीतने का ज़रिया बन सकता है, इसकी मिसाल हैं भारतीय जूडोका तूलिका मान। दिल्ली में 9 सितंबर 1998 को जन्मी तूलिका ने जूडो को…
बचपन में अकेलेपन को दूर करने के लिए शुरू किया गया एक खेल कैसे देश के लिए पदक जीतने का ज़रिया बन सकता है, इसकी मिसाल हैं भारतीय जूडोका तूलिका मान। दिल्ली में 9 सितंबर 1998 को जन्मी तूलिका ने जूडो को सिर्फ़ खुद को व्यस्त रखने के लिए अपनाया था, लेकिन आज वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का परचम लहरा रही हैं।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, तूलिका का बचपन आसान नहीं था। पिता के निधन के बाद उनकी माँ अमृता मान ने अकेले ही उनका पालन-पोषण किया। माँ के नौकरी पर जाने के बाद तूलिका को घर पर अकेले रहना पड़ता था। इसी अकेलेपन से बचने के लिए उन्होंने चौथी कक्षा में जूडो क्लास जाना शुरू किया और यहीं से इस खेल के प्रति उनका लगाव बढ़ता गया।
सफलता की सीढ़ियाँ
तूलिका ने राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में दमदार प्रदर्शन के बाद राष्ट्रीय स्तर पर रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। 78+ किग्रा वर्ग में खेलने वाली तूलिका ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी छाप छोड़ी। उन्होंने 2017 में बिश्केक और 2018 में बेरूत में आयोजित एशियन जूनियर चैंपियनशिप में कांस्य पदक अपने नाम किया।
उनकी सफलताओं का सिलसिला यहीं नहीं रुका। 2019 में काठमांडू में हुए दक्षिण एशियाई खेलों में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 2022 में बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में आई, जहाँ उन्होंने रजत पदक जीतकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा।
जूडो में भारत का बढ़ता क़द
तूलिका की यह कामयाबी उस दौर में आई है जब जूडो में भारतीय खिलाड़ियों की उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मज़बूत हो रही है। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने जूडो में 2 स्वर्ण और 1 रजत सहित कुल 3 पदक हासिल किए। यह पहली बार था जब देश को कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो का स्वर्ण पदक मिला। तूलिका ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में हिस्सा नहीं लिया था।
कड़ी मेहनत, त्याग और समर्पण के दम पर तूलिका मान आज देश की उन तमाम युवा लड़कियों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं, जो खेल के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहती हैं।
इनपुट: IANS


