उत्तर भारत के सिनेमाघर क्यों हो रहे खाली? दक्षिण से समझिए थिएटर कल्चर का पूरा गणित
ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने से फिल्में देखने का तरीका बदल गया है, लेकिन इसका असर पूरे देश में एक जैसा नहीं है। जहां उत्तर भारत के कई शहरों में सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या घटी है, वहीं दक्षिण के…
ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने से फिल्में देखने का तरीका बदल गया है, लेकिन इसका असर पूरे देश में एक जैसा नहीं है। जहां उत्तर भारत के कई शहरों में सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या घटी है, वहीं दक्षिण के राज्यों में आज भी बड़े पर्दे का जादू बरकरार है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे सिर्फ ओटीटी नहीं, बल्कि टिकट की कीमतें, थिएटर का माहौल और फिल्मों के विकल्प जैसे कई बड़े कारण हैं।
समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, ट्रेड एनालिस्ट गिरीश वानखेड़े ने दक्षिण और उत्तर के बीच सबसे बड़े अंतर को रेखांकित किया। उन्होंने बताया, "साउथ और हमारे बीच सिर्फ इतना फर्क है कि वहां टिकट की कीमतों का एक स्लैब है। इसका मतलब है कि एक तय कीमत से ज्यादा टिकट नहीं बेचे जा सकते, जबकि नॉर्थ में ऐसी सीमा नहीं है।" इसी वजह से दक्षिण में टिकट सस्ते होते हैं और कई थिएटरों में 70 फीसदी से ज्यादा सीटें भरी रहती हैं।
टिकट की कीमत और माहौल का खेल
बिहार के पूर्णिया में चौथी पीढ़ी के थिएटर मालिक और इंडस्ट्री एक्सपर्ट विशेक चौहान का कहना है कि मामला सिर्फ टिकट के दाम का नहीं है। उन्होंने बताया कि एग्जीबिशन सेक्टर में बढ़ी कीमतों ने दर्शकों की आदत बदल दी है। जो दर्शक पहले साल में 10-12 फिल्में देखता था, अब वह महंगी टिकटों के कारण सिर्फ एक या दो फिल्मों के लिए ही थिएटर आता है।
चौहान ने दिल्ली और चेन्नई का उदाहरण देते हुए कहा, "दिल्ली में आपको 700 रुपए में टिकट बेचनी पड़ती है और वही चेन्नई में 190 रुपए में टिकट बिकती है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि बड़े मल्टीप्लेक्स खुद को एक 'प्रीमियम एक्सपीरियंस' के तौर पर पेश करते हैं, जिससे आम दर्शक असहज महसूस कर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई आम आदमी फाइव स्टार होटल में जाने से हिचकिचाता है।
कंटेंट की विविधता भी एक बड़ी वजह
एक और महत्वपूर्ण पहलू फिल्मों के विकल्पों का है। विशेक चौहान के मुताबिक, उत्तर भारत के दर्शक मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों पर निर्भर हैं। इसके विपरीत, दक्षिण के राज्यों में दर्शकों के पास कई विकल्प होते हैं। उन्होंने बताया, "कर्नाटक जैसे बाजारों में कन्नड़ के साथ तेलुगु, तमिल, मलयालम, हिंदी और हॉलीवुड फिल्मों के लिए भी दर्शक मौजूद हैं। इससे थिएटर बिजनेस को कंटेंट के ज्यादा विकल्प मिलते हैं।"
इनपुट: IANS


