खेल को मौलिक अधिकार बनाने पर सुप्रीम कोर्ट में बहस, 'फिजिकल लिटरेसी' पर याचिकाकर्ता ने जताई आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक ऐसी जनहित याचिका पर सुनवाई हुई जो खेल को संवैधानिक रूप से मौलिक अधिकार का दर्जा देने की मांग करती है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, याचिकाकर्ता डॉ. कनिष्क पांडे ने इस…
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक ऐसी जनहित याचिका पर सुनवाई हुई जो खेल को संवैधानिक रूप से मौलिक अधिकार का दर्जा देने की मांग करती है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, याचिकाकर्ता डॉ. कनिष्क पांडे ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'खेल के अधिकार' जैसे व्यापक संवैधानिक सवाल को 'फिजिकल लिटरेसी' (शारीरिक साक्षरता) की सीमित अवधारणा में नहीं समेटा जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मांग को 'सराहनीय' और 'बेहद जरूरी' बताया। कोर्ट ने टिप्पणी की, "अब इस डिजिटल युग में, बच्चे खेल के मैदानों से पूरी तरह दूर होते जा रहे हैं।"
क्यों अलग हैं 'खेल' और 'फिजिकल लिटरेसी'?
डॉ. पांडे की याचिका पर कोर्ट ने पहले एक 'एमिकस क्यूरी' (न्याय मित्र) नियुक्त किया था, जिनकी रिपोर्ट अदालत में पेश की गई। याचिकाकर्ता ने इसी रिपोर्ट के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई, खास तौर पर 'फिजिकल लिटरेसी' पर दिए गए ज़ोर को लेकर। उन्होंने तर्क दिया कि खेल, शारीरिक शिक्षा और फिजिकल लिटरेसी तीन अलग-अलग अवधारणाएं हैं और उन्हें एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता। उनका मानना है कि ऐसा करने से याचिका का मूल उद्देश्य ही बदल जाएगा।
याचिका का बड़ा मकसद
इस जनहित याचिका का आधार यह है कि हर बच्चे और नागरिक के सर्वांगीण विकास के लिए खेलों में भागीदारी ज़रूरी है। याचिका में कहा गया है कि इसे सिर्फ़ व्यक्तिगत पसंद या प्रतिस्पर्धी उत्कृष्टता तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। डॉ. कनिष्क पांडे ने अदालत को बताया, "इस पीआईएल का मकसद कभी भी सिर्फ चैंपियन बनाना या मेडल जीतना नहीं रहा है। खेल का दायरा प्रतिस्पर्धा में श्रेष्ठता से कहीं ज्यादा बड़ा है।"
याचिका के अनुसार, खेल के कई सामाजिक और विकासात्मक फायदे हैं। यह न सिर्फ शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि व्यक्तित्व विकास, अनुशासन, टीम वर्क और आत्मविश्वास जैसे गुण भी विकसित करता है। साथ ही यह तनाव और सामाजिक अलगाव को कम कर सामुदायिक एकजुटता को भी बढ़ावा देता है।
"खेल लोगों को बेहतर बनाता है"
याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में कहा कि खेल शिक्षा, स्वास्थ्य, युवा विकास और राष्ट्र निर्माण में एक साथ योगदान दे सकता है। उन्होंने कहा, "फिजिकल लिटरेसी (शारीरिक साक्षरता), फिजिकल एजुकेशन (शारीरिक शिक्षा) और खेल एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते।" उन्होंने आग्रह किया कि खेल को उसकी संवैधानिक स्थिति देने से पहले उसके संपूर्ण सामाजिक और विकासात्मक संदर्भ को समझना अनिवार्य है। मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
इनपुट: IANS


