जब एक लड़की ने मनोज कुमार से कहा- 'भारत होकर सिगरेट पीते हो, शर्म नहीं आती?', फिर जो हुआ वो कहानी बन गया
हिंदी सिनेमा में 'भारत कुमार' के नाम से मशहूर दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार अपनी देशभक्ति वाली फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन उनकी ज़िंदगी का एक दिलचस्प किस्सा है, जब एक अनजान लड़की की डांट ने…
हिंदी सिनेमा में 'भारत कुमार' के नाम से मशहूर दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार अपनी देशभक्ति वाली फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन उनकी ज़िंदगी का एक दिलचस्प किस्सा है, जब एक अनजान लड़की की डांट ने उन्हें हमेशा के लिए बदल दिया। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना के बाद मनोज कुमार ने अपनी सिगरेट पीने की लत को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।
यह उस दौर की बात है जब मनोज कुमार अपनी फिल्मों की वजह से घर-घर में 'भारत कुमार' के तौर पर पहचाने जाने लगे थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह एक बार अपने परिवार के साथ रेस्टोरेंट गए थे। वहां जब वह सिगरेट पी रहे थे, तो एक लड़की उनके पास आई और उन्हें टोकते हुए कहा, "आप भारत होकर सिगरेट पी रहे हैं, आपको शर्म नहीं आती?"
इस सीधी और तीखी बात का मनोज कुमार पर गहरा असर हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि दर्शक उन्हें सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक आदर्श के रूप में देखते हैं और 'भारत कुमार' की छवि के साथ कुछ ज़िम्मेदारियाँ भी जुड़ी हैं। बस उसी पल उन्होंने सिगरेट छोड़ने का पक्का फैसला कर लिया।
पाकिस्तान से 'भारत कुमार' बनने का सफ़र
मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था और उनका जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। बचपन से ही फिल्मों के शौकीन रहे मनोज, दिलीप कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक थे। दिलीप कुमार की फिल्म 'शबनम' में उनके किरदार से वह इतने प्रभावित हुए कि अपना नाम ही मनोज कुमार रख लिया।
मुंबई आने के बाद उन्हें 1957 में फिल्म 'फैशन' से ब्रेक मिला, जिसमें 19 साल की उम्र में उन्होंने एक बूढ़े भिखारी का किरदार निभाया था। लेकिन उन्हें असली पहचान 1965 में आई फिल्म 'शहीद' से मिली, जिसमें उन्होंने भगत सिंह का किरदार निभाया था।
जब शास्त्री जी की प्रेरणा से बनाई फिल्म
मनोज कुमार सिर्फ़ अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक सफल निर्देशक भी बने। उन्होंने 1967 में 'उपकार' फिल्म का निर्देशन किया, जिसकी प्रेरणा उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे 'जय जवान, जय किसान' से मिली थी। इस फिल्म की कामयाबी ने उनकी देशभक्त हीरो की छवि को और मजबूत कर दिया। इसके बाद उन्होंने 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974) और 'क्रांति' (1981) जैसी कई बड़ी और सफल फिल्में बनाईं।
सम्मान और विरासत
सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए मनोज कुमार को कई पुरस्कारों से नवाजा गया। भारत सरकार ने उन्हें 1992 में पद्म श्री और 2015 में सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।
इनपुट: IANS


