तिरंगे के पीछे की कहानी: जब एक भारतीय सैनिक के मन में जागा राष्ट्रध्वज का विचार
भारत की स्वतंत्रता और गौरव का प्रतीक तिरंगा सिर्फ तीन रंगों का संगम नहीं, बल्कि इसके पीछे एक गहरा संकल्प और राष्ट्रप्रेम की भावना छिपी है। इस ध्वज को मूर्त रूप देने का श्रेय स्वतंत्रता सेनानी पिंगली…
भारत की स्वतंत्रता और गौरव का प्रतीक तिरंगा सिर्फ तीन रंगों का संगम नहीं, बल्कि इसके पीछे एक गहरा संकल्प और राष्ट्रप्रेम की भावना छिपी है। इस ध्वज को मूर्त रूप देने का श्रेय स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया को जाता है, जिनका जन्म 2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में हुआ था। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, वेंकैया के मन में राष्ट्रीय ध्वज बनाने का विचार तब आया, जब वे ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा दे रहे थे।
पिंगली वेंकैया दक्षिण अफ्रीका में एंग्लो-बोअर युद्ध में शामिल हुए थे, जहाँ वे पहली बार गांधीजी के संपर्क में आए और उनकी विचारधारा से गहरे प्रभावित हुए। युद्ध के दौरान जब उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों को अपने ध्वज 'यूनियन जैक' को सलामी देते देखा, तो उनके मन में यह सवाल उठा कि भारत का अपना कोई एकीकृत ध्वज क्यों नहीं है। यहीं से भारत के लिए एक राष्ट्रीय ध्वज डिजाइन करने की यात्रा शुरू हुई।
ध्वज बनाने का संकल्प
भारत लौटकर 1906 में हुए एआईसीसी के अधिवेशन में उन्होंने अपना ध्वज बनाने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने महात्मा गांधी से भी यह सुझाव साझा किया, जिन्हें यह विचार बेहद पसंद आया। गांधीजी ने उन्हें स्वयं ध्वज का डिजाइन तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया। इतिहासकार राजीव लोचन ने एक साक्षात्कार में बताया, "पिंगली वेंकैया ने विचार किया कि हमें देश के लिए अलग से झंडा बनाना चाहिए, जोकि हमारे देश को आसानी से बता सके और उन्होंने झंडे के लिए तकरीबन 25 डिजाइनें चुनीं। झंडे के बारे में उन्होंने लोगों से चर्चा करना भी शुरू कर दिया था।"
तिरंगे का अंतिम स्वरूप
कई बदलावों और विचार-विमर्श के बाद, वेंकैया द्वारा डिजाइन किए गए ध्वज ने 1921 में अपना प्रारंभिक स्वरूप लिया। उस वक्त इसमें तीन पट्टियाँ विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व करती थीं और बीच में चरखा भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक था।
ध्वज में अंतिम परिवर्तन 1931 में हुए, जब रंगों को अंतिम रूप दिया गया। इसमें केसरिया रंग साहस, सफेद रंग शांति और हरा रंग उर्वरता व विकास का प्रतीक बना। चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल किया गया, जो धर्म और प्रगति का प्रतीक है। इसी स्वरूप को संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को औपचारिक रूप से भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। यह वही तिरंगा है, जो 15 अगस्त 1947 की सुबह एक नए युग के उदय के प्रतीक के रूप में फहराया गया था।
इनपुट: IANS


