एक स्पर्धा में निराशा, फिर तीन कांस्य पदक: पैरा-तैराक हिमांशु नंदल ने बताई अपनी वापसी की कहानी
जापान के आइची-नागोया में भारतीय पैरा-तैराक हिमांशु नंदल ने कांस्य पदकों की हैट्रिक लगाकर शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन उनकी यह सफलता एक शुरुआती निराशा के बाद मिली। समाचार एजेंसी IANS से बातचीत में 22…
जापान के आइची-नागोया में भारतीय पैरा-तैराक हिमांशु नंदल ने कांस्य पदकों की हैट्रिक लगाकर शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन उनकी यह सफलता एक शुरुआती निराशा के बाद मिली। समाचार एजेंसी IANS से बातचीत में 22 वर्षीय हिमांशु ने बताया कि पुरुषों की 100 मीटर बैकस्ट्रोक स्पर्धा में चौथे स्थान पर रहने से उन्हें गहरा धक्का लगा था, जिसके बाद खुद को मानसिक रूप से संभालना पड़ा।
हिमांशु ने कहा, “100 मीटर बैकस्ट्रोक मेरे मुख्य इवेंट्स में से एक था और मैं पिछले दो वर्षों से इसका इंतजार कर रहा था... उस दिन मेरा शरीर जैसे साथ ही नहीं दे रहा था। सब कुछ ठीक से नहीं हो पाया, मैं अपना 'पर्सनल बेस्ट' नहीं दे सका और उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा।” इस निराशा के बावजूद, हिमांशु ने हार नहीं मानी। उन्होंने आगे के पाँच इवेंट्स पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया, जिसका उन्हें शानदार नतीजा मिला।
निराशा को ताकत बनाकर जीते तीन मेडल
अपनी सोच में बदलाव लाने के बाद हिमांशु ने पुरुषों की 400 मीटर फ्रीस्टाइल एस11, 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक एस11 और 100 मीटर फ्रीस्टाइल एस11 स्पर्धाओं में लगातार तीन कांस्य पदक अपने नाम किए। उन्होंने अपना पहला पदक मंगलवार को 400 मीटर फ्रीस्टाइल में 5:10.91 के समय के साथ जीता। उनका आखिरी पदक शुक्रवार को 100 मीटर फ्रीस्टाइल में आया, जहाँ उन्होंने 1 मिनट 5.90 सेकंड का समय निकाला। इस रेस में जापान के उचु टोमिता (58.22 सेकंड) ने स्वर्ण और चीन के चुआनझेन सन (58.70 सेकंड) ने रजत जीता।
हिमांशु के अनुसार, “सबसे बेहतरीन और चुनौतीपूर्ण रेस 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक थी, क्योंकि ब्रॉन्ज और चौथे स्थान के बीच का अंतर बहुत कम था। बस कुछ माइक्रो सेकंड का, मानो बाल-बाल का फासला हो।”
जूडो से तैराकी तक का सफर
हरियाणा के रोहतक में जन्मे हिमांशु ऑप्टिक नर्व फेल होने के कारण दृष्टिहीन हैं। उनके पिता राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी थे, इसलिए खेल उन्हें विरासत में मिला। चार साल की उम्र में दिल्ली आने के बाद उन्होंने जूडो से शुरुआत की और राष्ट्रीय स्तर पर पदक भी जीते, लेकिन बाद में कोचों के प्रोत्साहन पर उन्होंने तैराकी को अपना लिया। पानी से एलर्जी जैसी शुरुआती चुनौतियों के बावजूद उन्होंने तैराकी में खुद को स्थापित किया।
यह सफर उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले गया। 2024 में, वह पेरिस पैरालंपिक के लिए 'मिनिमम क्वालिफिकेशन स्टैंडर्ड' हासिल करने वाले पहले भारतीय दृष्टिहीन तैराक बने। इसके बाद उन्होंने सिंगापुर में 2025 वर्ल्ड पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप के दो फाइनल में भी जगह बनाई।
पढ़ाई और खेल में संतुलन
दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक हिमांशु अब स्पोर्ट्स मैनेजमेंट में आगे की पढ़ाई करना चाहते हैं। उनका मानना है कि खेलों से जुड़ी पढ़ाई करना दिलचस्प होगा क्योंकि वह खुद इससे व्यावहारिक रूप से जुड़े हैं। ‘एस11’ क्लासिफिकेशन में प्रतिस्पर्धा करने वाले हिमांशु ने बताया कि दृष्टिहीन तैराकों की ट्रेनिंग सामान्य होती है, बस पूल में दिशा बनाए रखने के लिए ‘टैपर’ की मदद ली जाती है। उनका अगला लक्ष्य लगातार अपने व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को बेहतर करना है, ताकि वह पोडियम के शीर्ष पर पहुंच सकें।
इनपुट: IANS


