शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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देवताओं का महाकुंभ: कुल्लू में 347 देवी-देवताओं के आगमन से अंतर्राष्ट्रीय दशहरा उत्सव का भव्य आगाज़

हिमाचल प्रदेश की मनमोहक घाटी में स्थित कुल्लू का ऐतिहासिक ढालपुर मैदान एक बार फिर आस्था और संस्कृति के अनूठे संगम का गवाह बन रहा है। बुधवार से यहाँ सात दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव की…

देवताओं का महाकुंभ: कुल्लू में 347 देवी-देवताओं के आगमन से अंतर्राष्ट्रीय दशहरा उत्सव का भव्य आगाज़
(फोटो: IANS)

हिमाचल प्रदेश की मनमोहक घाटी में स्थित कुल्लू का ऐतिहासिक ढालपुर मैदान एक बार फिर आस्था और संस्कृति के अनूठे संगम का गवाह बन रहा है। बुधवार से यहाँ सात दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव की शुरुआत हो गई है, जिसे 'देवताओं का महाकुंभ' भी कहा जाता है। यह उत्सव 21 अक्टूबर से 27 अक्टूबर तक चलेगा और इसकी सबसे बड़ी पहचान भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा है, जिसमें सैकड़ों देवी-देवता शामिल होते हैं। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष उत्सव के लिए कुल 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है।

यह उत्सव देश के अन्य दशहरा समारोहों से बिल्कुल अलग है। यहाँ बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक रावण, कुंभकरण या मेघनाद के पुतले नहीं जलाए जाते। इसके बजाय, यह पर्व देवी-देवताओं के मिलन और भगवान रघुनाथ के प्रति उनकी आस्था को समर्पित है। उत्सव की शुरुआत के लिए बुधवार सुबह से ही विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं की पालकियाँ भगवान रघुनाथ के मंदिर में पहुँचने लगीं। माता हडिंबा के आगमन के बाद दोपहर में मुख्य रथयात्रा का शुभारंभ हुआ।

देव संस्कृति और परंपरा

कुल्लू दशहरा की यह अनूठी परंपरा 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह के समय शुरू हुई थी, जब उन्होंने भगवान रघुनाथ की प्रतिमा को अपनी राजगद्दी पर स्थापित किया था। तभी से यह उत्सव इसी भव्यता के साथ मनाया जा रहा है। भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने बताया, "रघुनाथ जी कुल्लू के आराध्य देव हैं। लोग दूर-दूर से पैदल चलकर रघुनाथ जी से मिलने और अपनी बात रखने आ रहे हैं। हम इसे अपनी भाषा में 'चक्री' बोलते हैं।"

दानवेंद्र सिंह ने आगे कहा, "गाँव में रघुनाथ जी को ठाकुर जी बोलते हैं क्योंकि विष्णु भगवान भी ठाकुर के रूप में माने जाते हैं।" इस उत्सव के दौरान ढालपुर के कला केंद्र में हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इनमें पारंपरिक कुल्लवी नाटी, लोक नृत्य और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की प्रस्तुतियाँ मुख्य आकर्षण होती हैं, जो इस घाटी की समृद्ध संस्कृति को दर्शाती हैं।

इनपुट: IANS

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